July 10, 2020

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अपनी इच्छाओ को बढ़ा लेना अर्थात इच्छाशक्ति को कम कर लेना : मनोज श्रीवास्तव

अपनी इच्छाओ को बढ़ा लेना अर्थात इच्छाशक्ति को कम कर लेना : मनोज श्रीवास्तव
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सार ….विस्तार भाग -2 
* अपनी इच्छाआंे को बढ़ा लेना अर्थात इच्छाशक्ति को कम कर लेना है। हमारी इच्छा से दुनिया तभी चलेगी          जब इच्छा की जगह हमारी इच्छाशक्ति मजबूत होगी।
* किसी बात में हार खाने का मूल कारण है, बार -बार स्वयं को चेक न करना। जो समय- समय हमें विभिन्न             माध्यमों से युक्तियां मिलती है उसे समय पर उसका उपयोग हम नही करते है।
* हमारी दिव्य बुद्धि हमारे लिए एक चेकिंग करने का यंत्र है। दिव्य बुद्धि के अभाव में हम जो रॉन्ग है उसे राइट      समझ लेते है अथवा जो राइट है उसे रांग समझ लेते हैं।
आगे……

दूसरांे के मन मे चलने वाले संकल्पो को पढ़ने के लिये हम सबसे पहले अपने संकल्पो पर ब्रेक लगाना होगा। अपने संकल्पो को समेटकर एक तरफ रख लें इसके बाद दूसरे के मन में चलने वाले संकल्पों को पढ़ने का प्रयास करें। क्योकि जब तक हम अपने संकल्पो को नही पढ़ेंगे तब तक दुसरो के संकल्पो को कैसे पढ़ पाएंगे ?
महान कार्य करने के लिए अपने पुरुषार्थ की तीव्र गति और पॉवरफुल ब्रेक की जरूरत है। क्योकि हमारी परिस्थियां बुद्धि में अनेक संकल्प पैदा करती है।

इस समय सभी संकल्पो से परे एक समर्थ संकल्प में स्थित होने का अभ्यास होना चाहिये। जिस समय बुद्धि विस्तार में बिखरी हो, उस समय पॉवरफुल ब्रेक से मन में चलने वाले संकल्पों को स्टॉप करने की प्रैक्टिस होनी चाहिये। अर्थात जितना समय चाहे उतना एक समर्थ संकल्प में अपने को स्थित कर लें।  इसे ही हम यथार्त योग कहते है।
अनुभव का अर्थ है गहराई से भरा हुआ अनुभव। सागर के तल पर अनुभव के रत्न प्राप्त करने के लिये अभ्यास जरूरी है। अभ्यासी व्यक्ति अर्थात लगन में मगन रहने व्यक्ति के सामने किसी प्रकार का विघ्न ठहर नही सकता है। इसके लिये हमें अभ्यास की प्रयोगशाला में बैठना होगा। अभ्यास से हमें सागर के तल पर विचित्र प्रकार के अनुभव रत्न प्राप्त होंगे। इस अभ्यास से के बाद हम स्वतः समर्थ बन जाएंगे। इसके लिए हमें सबसे पहले अपने संकल्प स्तर पर सम्पर्ण , फिर बुद्धि स्तर पर सम्पर्ण और अंत मे संस्कार स्तर पर सम्पर्ण होना है।
हमारे हार का अर्थ है निश्चय में कमी होना। विघ्न को समाप्त करने की युक्ति है, विघ्न को पेपर समझ कर पास करना। पेपर में हमें भिन्न भिन्न प्रश्न मिलते हैं। यह प्रश्न कभी मन का होता है, कभी लोग क्या कहेंगे विषय पर होता है। जो भी लक्ष्य रखा जाता है उसे पूर्ण करने के लिये हमें उसके अनुसार लक्षण भी भरने होते हैं। ढीले कोशिश वाले, कोशिश शब्द में ही फंसे रह जाते हैं। कोशिश शब्द एक कमजोरी है। कमजोरी को मिटाने के लिये कोशिश शब्द को मिटाना होगा। निश्चय में विजय है, संशय में कमजोरी है। माया प्रतिज्ञा तुड़वाती है।
संकल्प तो हम कई बार करते हैं लेकिन दृढ़ संकल्प नहीं करते हैं। होगा नहीं बल्कि होना ही है। होगा एक संकल्प है जबकि होना ही है एक दृढ़ संकल्प है। यदि दृढ़ संकल्प के स्थान पर संकल्प करते हैं, इसका अर्थ है अपने सफलता के सीमेंट में रेत मिला देते हैं। यदि हम कहते हैं अच्छा देखेंगे, जितना हो सकता है करेंगे, इसका अर्थ है हम अपने सफलता के फाउण्डेशन को कमजोर कर लेते हैं।
व्यर्थ विचार, नकारात्मक विचार बन कर हमारे निश्चय के फाउंडेशन को हलचल में लाकर कमजोर कर देती है। संकल्पो से हार खाने वाले व्यक्ति की विजय असम्भव है। निश्चय और निश्चिन्त अवस्था ही विजय दिलाती है। हिम्मत से चलना है और थकना नही है। थकावट महसूस होने का अर्थ हार जाना है।
व्यर्थ का अर्थ है जो समर्थ न हो। यदि व्यर्थ है, तब समर्थ संकल्प ठहर नही सकता है। व्यर्थ हमारे उमंग उत्साह को समाप्त करता है। व्यर्थ संकल्प में क्यो ,कैसे , जैसे प्रश्न मन मे चलने लगता है। व्यर्थ संकल्प में व्यक्ति ऊँची- ऊँची सोचता है लेकिन यह समर्थ संकल्प न होने के कारण यह प्रैक्टिकल में नही आ पाता है। ऐसी स्थिति में सोचना और करना, कथनी और करनी और लक्ष्य ओर लक्षण में अंतर आ जाता है।
व्यर्थ संकल्प बहुत तेज चलता है। व्यर्थ संकल्पो का तूफान एक ऐसा तेज तूफान है जो तांडव नृत्य करता है। समर्थ संकल्प धीमी गति से चलता है तथा समर्थ संकल्प सदा ऊर्जा जमा करता है। यदि हम समर्थ संकल्प पर ध्यान न दे तब व्यर्थ को चांस मिल जाता है। इसलिए बुद्धि को समर्थ संकल्पो से भरपूर रखना चाहिए। समर्थ संकल्प पैदा करने के लिये, अच्छी बात सुनना इसके बाद इसे  सामाना और अपने जीवन के अनुभव में लाकर इसका स्वरूप बनना ही उपाय है। हम ऐसा अचल अडोल बने कि हमें हिलाने वाला हिल जाए लेकिन हम न हिल पायें।
इसके लिए हम अपनी सभी जिम्मेदारी ईश्वर को सौंप दे। अपना सभी बोझ ईश्वर को सौंप कर हल्के हो जाये। अर्थात अपने बुद्धि से सम्पूर्ण रूप से समर्पित  हो जाये। बुद्धि से समर्पित होने पर हमारे भीतर कोई नेगेटिव बात बुद्धि में प्रवेश नही करेंगी। जागरूक रहकर चेकिंग के बाद हमे अपनी कमियां और गलतियां दिखाई देने लगेगी। हम किसी बात को दूसरों की अपेक्षा स्वयं को जिम्मेदार मानेंगे।
रास्ते मे पैदा होने वाले हलचल को ईश्वर के चरणों मे समपर्ण ही इसका उपाय है। दृढ़ संकल्प के सीट का बेल्ट बाधने से, हम अपसेट होने से बच जाएंगे। नो क्वेश्चन मार्क ,ओनली एक्सेप्टेन्स।
किसी घटना को, लेकिन शीतलता की शक्ति से जब  चाहें व्यर्थ संकल्प को कंट्रोल कर सकते है। इसे समर्थ संकल्प में परिवर्तित कर सकते है। शीतलता की शक्ति हमे व्यर्थ संकल्प से बचाती है। व्यर्थ संकल्प ही हमारे एक्सीडेंट का कारण बनता है। क्या,क्यो,कैसे,ऐसा नही वैसा, यह सभी व्यर्थ संकल्प हैं।
लक्ष्य के प्रति दृढ़ता, लक्ष्य तक पहुचने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। लक्ष्य के प्रति दृढ़ता मिलते है, हम लक्ष्य के मार्ग में मिलने वाली बाधक तत्वों को स्वतः ही छोड़ने लगते है। हमारे मन मे जितना कम संकल्प मौजूद होगा, उतनी ही हमारी स्थिति अधिक मजबूत होगी। साधना, साधन पर आधारित नही है बल्कि साधना स्वयं साधनों को आधार बना देती है। यह योगी और प्रयोगी व्यक्ति के लिये अत्यंत सहज है।

पुराने व्यर्थ संकल्प को छोड़ कर ,नई रचना के ,नए युग की का समर्थ संकल्प करना अर्थात नई जीवन की अनुभूति करना। हमारे जीवन का बदलना अर्थात हमारे संस्कार, संकल्प और सम्बन्ध सभी कुछ बदल जाना है। अर्थात पुराना समाप्त होना और एक नए जीवन का प्रारम्भ होना।
अर्थात नई जीवन की अनुभूति का अनुभव करना है। स्व स्थिति में स्थित होकर अपने नवीन कार्य का श्रीगणेश करना है। स्वास्तिक को भी गणेश कहते है क्योंकि स्वास्तिक स्व स्थिति में स्थित होने का प्रतीक है अर्थात सम्पूर्ण रचना के नॉलेज का सूचक है। स्वास्तिक में पूरी रचना का नॉलेज समाया है।

किसी कार्य के सफलता का आधार है नॉलेजफुल अर्थात समझदार बनाना। यदि नॉलेजफुल समझदार बन गए है तब हर कर्म श्रेष्ठ और सफल होगा। हम जो भी संकल्प करेंगे उसमे हमें संकल्प और सफलता दोनो का अनुभव होगा। स्वास्तिक अर्थात स्व स्थति में स्थित होकर हमें अपने नवीन कार्य का श्रीगणेश करना है।
यदि समय पर कार्य न हो सका तब इसका अर्थ है कि होते हुए भी न होना। चेक करें कि जिस समय हमें जिस शक्ति की आवश्यकता है हम उस शक्ति का प्रयोग कर पाते है। दुसरो को देखना सहज लगता है लेकिन अपने को देखने मे मेहनत लगती है। इस कारण हमें जितना मिलना चाहिये उतना नही मिल पाता है। इसका मूल कारण है- परदृष्टि ,परचिन्त और प्रपंच पर अपना समय खर्च करके अपने भीतर व्यर्थ संकल्प पैदा करना।
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